हॉफ पहाड़न : जड़ों, रिश्तों और पहचान के बीच की कहानी
उत्तराखण्ड की पहाड़ियों से निकलकर मैदानों की ओर आने वाले लोगों की कहानी केवल रोज़गार की कहानी नहीं होती, वह पहचान, संस्कार और समय के साथ बदलती सोच की कहानी भी होती है। ऐसी ही कहानी है जोशी जी के परिवार की। जोशी जी उन हजारों पहाड़ी युवाओं में से थे, जो बेहतर भविष्य की तलाश में अपने गाँव से निकलकर दिल्ली आ बसे। शुरू में किराए के छोटे से कमरे में रहते हुए उन्होंने नौकरी की, संघर्ष किया, परिवार को सँभाला और धीरे-धीरे शहर में अपनी जगह बना ली। समय बीता, पाँच बच्चे हुए। जोशी जी और उनकी पत्नी ने पहाड़ से मिले संस्कारों को संभाले रखते हुए बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया। घर में पहाड़ी बोली भी थी, त्योहार भी थे, और दाल-भात की खुशबू भी। साथ ही शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी भी थी। सब कुछ ठीक चल रहा था। बड़ी बेटी की पढ़ाई पूरी हुई, उसकी शादी अच्छे घर में कर दी गई। परिवार ने चैन की साँस ली कि एक बड़ी जिम्मेदारी पूरी हुई। लेकिन कहानी यहीं से मोड़ लेती है। जोशी जी की मझली बेटी कॉलेज में पढ़ रही थी। कॉलेज का माहौल, नई सोच, नए दोस्त और शहर की खुली हवा — इन सबके बीच उसे एक लड़के से प्यार हो गया।...