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Showing posts from February, 2026

हॉफ पहाड़न : जड़ों, रिश्तों और पहचान के बीच की कहानी

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उत्तराखण्ड की पहाड़ियों से निकलकर मैदानों की ओर आने वाले लोगों की कहानी केवल रोज़गार की कहानी नहीं होती, वह पहचान, संस्कार और समय के साथ बदलती सोच की कहानी भी होती है। ऐसी ही कहानी है जोशी जी के परिवार की। जोशी जी उन हजारों पहाड़ी युवाओं में से थे, जो बेहतर भविष्य की तलाश में अपने गाँव से निकलकर दिल्ली आ बसे। शुरू में किराए के छोटे से कमरे में रहते हुए उन्होंने नौकरी की, संघर्ष किया, परिवार को सँभाला और धीरे-धीरे शहर में अपनी जगह बना ली। समय बीता, पाँच बच्चे हुए। जोशी जी और उनकी पत्नी ने पहाड़ से मिले संस्कारों को संभाले रखते हुए बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया। घर में पहाड़ी बोली भी थी, त्योहार भी थे, और दाल-भात की खुशबू भी। साथ ही शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी भी थी। सब कुछ ठीक चल रहा था। बड़ी बेटी की पढ़ाई पूरी हुई, उसकी शादी अच्छे घर में कर दी गई। परिवार ने चैन की साँस ली कि एक बड़ी जिम्मेदारी पूरी हुई। लेकिन कहानी यहीं से मोड़ लेती है। जोशी जी की मझली बेटी कॉलेज में पढ़ रही थी। कॉलेज का माहौल, नई सोच, नए दोस्त और शहर की खुली हवा — इन सबके बीच उसे एक लड़के से प्यार हो गया।...

उपवास का स्वादिष्ट संस्करण, व्रत हो और खाने को मखाने हों…

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हमारे समाज में व्रत अब तपस्या कम और टेस्ट ज्यादा हो गया है। पहले व्रत का मतलब होता था संयम, साधना और आत्मनियंत्रण। लोग दिन भर फलाहार करते थे, पानी पीकर भगवान का नाम लेते थे और शाम को थोड़ा सा प्रसाद खाकर संतोष कर लेते थे। लेकिन आधुनिक व्रत ने तो खानपान की परिभाषा ही बदल दी है। अब व्रत में भूखे रहने का नहीं, बल्कि “क्या-क्या खाया जा सकता है” का शोध चलता है। सुबह उठते ही घोषणा होती है — “आज मेरा व्रत है।” और उसके साथ ही रसोई में विशेष मेन्यू तैयार होने लगता है। सबसे पहले मखाने घी में भुनते हैं, फिर कटोरी में काजू-बादाम सजते हैं। फल की प्लेट ऐसी सजती है जैसे किसी होटल का बुफे हो — सेब, संतरा, केला, अनार, पपीता… भगवान भी सोचें कि यह व्रत है या फल महोत्सव! दोपहर तक भूख थोड़ी बढ़ती है, तो व्रत वाले चिप्स आ जाते हैं। उनके पैकेट पर बड़े गर्व से लिखा होता है — “उपवास स्पेशल”। अब भले ही ये तेल में तले हों, मसालों से भरपूर हों, पर क्योंकि उन पर “व्रत” लिखा है, इसलिए यह आध्यात्मिक भोजन घोषित हो जाता है। और अगर शाम तक भी भूख शांत न हो तो साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू के पकौड़े, सिंघाड़े का हलवा… यानी व्र...

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को इज़रायल की संसद द्वारा 'स्पीकर ऑफ़ द नेसेट' मेडल से सम्मानित

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प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को इज़रायल की संसद द्वारा 'स्पीकर ऑफ़ द नेसेट' मेडल से सम्मानित किया जाना प्रत्येक भारतवासी के लिए गौरव का क्षण है। यह सम्मान 140 करोड़ भारतीयों की सामूहिक शक्ति, विश्वास और वैश्विक प्रभाव का प्रतीक है। आदरणीय प्रधानमंत्री जी के दूरदर्शी व निर्णायक नेतृत्व ने आज भारत का मान-सम्मान विश्व मंच पर नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। वैश्विक कूटनीति, आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक प्रभाव हर क्षेत्र में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा प्रधानमंत्री जी के सशक्त नेतृत्व की पहचान है।

पढ़ाई की खोज में छात्र : कार्यक्रमों के जंगल में अकादमिकता की तलाश

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हमारे शिक्षण संस्थानों में इन दिनों पढ़ाई एक दुर्लभ प्रजाति बन चुकी है। जैसे जंगल में कभी-कभार कोई बाघ दिख जाए तो लोग फोटो खींचते हैं, वैसे ही कॉलेज में यदि गलती से कोई पूरी क्लास हो जाए तो छात्र नोट्स संभालकर रखते हैं — “इतिहास का हिस्सा है भाई, दोबारा नहीं मिलेगा।” पिछले हफ्ते की ही बात है। तीन दिन स्पोर्ट्स मीट हुआ। उसके बाद तीन दिन वार्षिक उत्सव। फिर दो दिन कॉलेज बंद — शायद उत्सव की थकान उतारने के लिए। मंगलवार को गेस्ट लेक्चर — ताकि पढ़ाई का भ्रम बना रहे। और अब शुक्रवार को एक और सेमिनार। ऊपर से आज बारह में से पाँच फैकल्टी छुट्टी पर। अब प्रश्न यह नहीं है कि पढ़ाई कैसे होगी। प्रश्न यह है कि पढ़ाई नाम की चीज़ बची भी है या नहीं। शिक्षा का नया टाइमटेबल पहले टाइमटेबल में विषय होते थे — गणित, भौतिकी, साहित्य, अर्थशास्त्र। अब नया टाइमटेबल कुछ ऐसा है: सोमवार — रिहर्सल मंगलवार — गेस्ट लेक्चर बुधवार — प्रतियोगिता गुरुवार — तैयारी शुक्रवार — सेमिनार शनिवार — फोटो अपलोड बीच में अगर गलती से क्लास हो जाए तो उसे “अतिरिक्त गतिविधि” कहा जाता है। छात्र अब सिलेबस नहीं, कार्यक्रमों की श्रृंखला याद रखते...

बीमार रहने के लिए छुट्टी चाहिए, या छुट्टी के लिए बीमार होना है?

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हमारे देश में बीमारी भी बड़ी लोकतांत्रिक चीज़ है — यह कभी भी, कहीं भी, और किसी पर भी आ सकती है। लेकिन शिक्षण संस्थानों में तो बीमारी का स्वरूप कुछ अलग ही दिखाई देता है। यहाँ बीमारी अक्सर मौसम देखकर नहीं, बल्कि टाइम-टेबल देखकर आती है। और खास बात यह कि यह बीमारी छुट्टी के साथ ही ठीक भी हो जाती है। कहावत है कि “स्वास्थ्य ही धन है”, पर कुछ लोग इसे इस तरह समझ बैठे हैं कि “छुट्टी ही स्वास्थ्य है।” इसलिए छुट्टी मिलते ही उनका स्वास्थ्य खिल उठता है, और काम दिखते ही तबीयत फिर से नाज़ुक हो जाती है। बीमारी का वैज्ञानिक समय अगर किसी फैकल्टी का पहला पीरियड सुबह 9 बजे हो, तो उसकी तबीयत रात 8 बजे से ही खराब होने लगती है। व्हाट्सऐप पर मैसेज आता है — “सर, अचानक तेज बुखार है, आज नहीं आ पाऊँगा।” और आश्चर्य देखिए, यही बुखार अगले दिन ठीक भी हो जाता है, खासकर तब जब उस दिन दो ही पीरियड हों या कोई मीटिंग न हो। सबसे अद्भुत बीमारी तब आती है जब कॉलेज में कोई निरीक्षण, अतिरिक्त क्लास या पेपर-सेटिंग का काम हो। तब अचानक स्टाफ में वायरल का ऐसा प्रकोप फैलता है कि मेडिकल साइंस भी चकरा जाए। लगता है जैसे वायरस ने भी प्रश...

समय का चमत्कार : छात्र देर से आए तो अपराध, शिक्षक देर से आए तो परंपरा

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हमारे शिक्षण संस्थान बड़े अद्भुत होते हैं। यहां समय भी लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि पदानुसार व्यवहार करता है। छात्र के लिए समय सेकंड में चलता है, जबकि शिक्षक के लिए मिनटों और कभी-कभी घंटों में। यदि कोई छात्र पाँच मिनट देर से कक्षा में पहुँच जाए तो मानो उसने इतिहास की सबसे बड़ी भूल कर दी हो। दरवाज़ा उसके सामने ऐसे बंद होता है जैसे वह कक्षा नहीं, संसद का गुप्त सत्र हो। शिक्षक उसे देखते हैं, चश्मा थोड़ा नीचे खिसकाते हैं और गंभीर स्वर में कहते हैं — “अनुशासन सीखिए, यह स्कूल नहीं, कॉलेज है।” छात्र बेचारा सोचता है कि शायद उसने समय नहीं, बल्कि संविधान का उल्लंघन कर दिया। लेकिन यही कक्षा तब अत्यंत लचीली हो जाती है जब शिक्षक महोदय का आगमन निर्धारित समय से बीस मिनट बाद होता है। तब समय की परिभाषा बदल जाती है। “स्टाफ मीटिंग थी…” “जरूरी काम था…” “कॉपी चेक कर रहा था…” और कभी-कभी तो शिक्षक आते ही घोषणा करते हैं — “आज क्लास नहीं होगी, अगली बार पढ़ लेंगे।” छात्र मन ही मन सोचता है कि यदि यही तर्क वह दे देता, तो शायद उसे गेट से ही बाहर भेज दिया जाता। अनुशासन : नीचे वालों के लिए विशेष योजना हमारे संस्थानों में...

अतिथि सत्कार बनाम अध्ययन संस्कृति – लाइब्रेरी कब तक बनेगी पेंट्री?

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शैक्षणिक संस्थानों में अतिथि व्याख्यान ज्ञानवर्धन का महत्वपूर्ण माध्यम माने जाते हैं। विशेषज्ञों का अनुभव सुनने से विद्यार्थियों को नई दिशा मिलती है और शिक्षा का स्तर समृद्ध होता है। परंतु विडंबना तब सामने आती है जब ऐसे ज्ञानपरक आयोजनों की व्यवस्था ही शिक्षा के मूल केंद्रों को प्रभावित करने लगे। आज फिर कॉलेज में अतिथि व्याख्यान आयोजित हुआ, और एक बार फिर लाइब्रेरी का उपयोग “पेंट्री” के रूप में कर लिया गया। लाइब्रेरी वह स्थान होता है जहाँ विद्यार्थी शांत वातावरण में बैठकर पढ़ते हैं, शोध करते हैं और अपने भविष्य की नींव तैयार करते हैं। यहाँ का अनुशासन, शांति और गंभीरता ही उसकी पहचान होती है। परंतु कार्यक्रम के दिन यह माहौल अचानक बदल जाता है। रीडिंग रूम में केतली, कप, बिस्कुट के डिब्बे और स्नैक्स के पैकेट सज जाते हैं। स्टाफ की चहल-पहल, बर्तनों की आवाज और लगातार आना-जाना उस शांति को भंग कर देता है, जो किसी भी लाइब्रेरी की आत्मा होती है। इस स्थिति का सबसे अधिक प्रभाव विद्यार्थियों पर पड़ता है। जो छात्र पढ़ने के लिए लाइब्रेरी आते हैं, उन्हें या तो लौटना पड़ता है या शोर-शराबे में पढ़ने को मजबूर...

उत्तराखण्ड का लोकपर्व फूलदेई : प्रकृति, संस्कृति और बचपन की मुस्कान का उत्सव

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भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में प्रत्येक क्षेत्र की अपनी लोकपरम्पराएँ, उत्सव और सांस्कृतिक पहचान होती है। पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि वे समाज की सामूहिक स्मृति, प्रकृति के साथ उसके संबंध और पीढ़ियों से चले आ रहे जीवन मूल्यों का प्रतीक भी होते हैं। हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में मनाया जाने वाला फूलदेई ऐसा ही एक लोकपर्व है, जो प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, बाल-संस्कार और सामुदायिक प्रेम का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यह पर्व चैत्र संक्रांति के दिन मनाया जाता है और बसन्त ऋतु के स्वागत का प्रतीक है। यह त्योहार मुख्यतः कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है, हालांकि इसकी छाप पूरे भारत की लोकसंस्कृति में दिखाई देती है। प्रकृति का नवजीवन और फूलदेई फूलदेई केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के पुनर्जागरण का उत्सव है। पतझड़ के बाद जब पेड़ों पर नए कोमल पत्ते निकलते हैं, खेतों में हरियाली लौटती है, पहाड़ों की ढलानों पर बुरांश, फ्योंली, पिंगू और जंगली फूल खिल उठते हैं, तब पूरा वातावरण मानो जीवन के नए अध्याय का स्वागत करता है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ पहाड़ी गांवों...

कार्यक्रमों की भीड़ में खोती पढ़ाई

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आजकल शिक्षण संस्थानों का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले कॉलेज और विश्वविद्यालय अब धीरे-धीरे इवेंट, उत्सव और आयोजनों के केंद्र बनते जा रहे हैं। पिछले सप्ताह ही तीन दिन का स्पोर्ट्स मीट हुआ, उसके तुरंत बाद तीन दिन का वार्षिक उत्सव आयोजित कर दिया गया। दो दिन कॉलेज बंद रहा और आज फिर गेस्ट लेक्चर। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है — पढ़ाई आखिर कब होगी? निस्संदेह, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अतिथि व्याख्यान छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होते हैं। खेल शरीर को स्वस्थ बनाते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और अतिथि व्याख्यान नई दृष्टि प्रदान करते हैं। लेकिन जब ये गतिविधियाँ संतुलन खो देती हैं और नियमित कक्षाओं को पीछे धकेल देती हैं, तब शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित होने लगता है। छात्र कॉलेज में प्रवेश इसलिए लेते हैं कि वे विषयों का गहन अध्ययन कर सकें, ज्ञान अर्जित कर सकें और अपने भविष्य की नींव मजबूत बना सकें। परन्तु जब सप्ताह भर तक पढ़ाई बाधित रहे, कक्षाएं स्थगित हों और शिक्षक भी कार्यक्रमों की तैयारियों में व्यस्त रहें, तब...

अखिलेश दास गुप्ता इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्ट्डीज (ADGIPS), बीबीडी समूह के अंतर्गत संचालित प्रतिष्ठित संस्थान, में 19 से 21 फरवरी तक तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव “उत्कर्ष 2026” का भव्य आयोजन

अखिलेश दास गुप्ता इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्ट्डीज (ADGIPS), बीबीडी समूह के अंतर्गत संचालित प्रतिष्ठित संस्थान, में 19 से 21 फरवरी तक तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव “उत्कर्ष 2026” का भव्य आयोजन किया गया। इस वर्ष के उत्सव की थीम “विरासत से विकास तक” रही, जिसका उद्देश्य भारतीय सांस्कृतिक धरोहर, विविधता और आधुनिक प्रगति के बीच संतुलन स्थापित करने का संदेश देना था। कार्यक्रम में दिल्ली-एनसीआर के विभिन्न कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और संस्थानों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ आभा वर्मानी , संयुक्त कुलसचिव, गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। अपने उद्घाटन संबोधन में डॉ. वर्मानी ने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों को समझें तथा उन्हें आधुनिक सोच के साथ जोड़कर समाज के विकास में योगदान दें। उन्होंने कहा कि “कश्मीर से कन्याकुमारी तक अनेक भाषाएँ, परंपराएँ और संस्कृतियाँ होते हुए भी हम एक सूत्र में बंधे हैं। यही हमारी राष्ट्रीय पह...

वार्षिक कार्यक्रमों की चकाचौंध में खोती लाइब्रेरी की गरिमा

शैक्षणिक संस्थानों में वार्षिक कार्यक्रम उत्सव की तरह मनाए जाते हैं। मंच सजता है, अतिथि आते हैं, भाषण होते हैं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ होती हैं और संस्थान अपनी उपलब्धियाँ प्रदर्शित करता है। यह सब आवश्यक भी है, क्योंकि ऐसे कार्यक्रम संस्थान की पहचान और ऊर्जा को दर्शाते हैं। परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन आयोजनों की तैयारी में शैक्षणिक मूल्यों की अनदेखी होने लगे। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति तेजी से देखी जा रही है कि कॉलेजों में वार्षिक कार्यक्रमों के दौरान लाइब्रेरी जैसे गंभीर शैक्षणिक स्थानों का उपयोग अस्थायी व्यवस्था के लिए कर लिया जाता है। लाइब्रेरी का रीडिंग रूम, जहाँ सामान्य दिनों में विद्यार्थी शांत वातावरण में अध्ययन करते हैं, अचानक कार्यक्रम के समय “अतिथि सत्कार कक्ष” में बदल दिया जाता है। वहीं चाय बनती है, पानी की बोतलें रखी जाती हैं, स्नैक्स पैक होते हैं और स्टाफ की आवाजाही बढ़ जाती है। जिस स्थान की पहचान शांति, अनुशासन और अध्ययन से जुड़ी होती है, वह कुछ ही घंटों में एक अस्थायी कैंटीन जैसा रूप ले लेता है। इससे न केवल लाइब्रेरी का वातावरण प्रभावित होता है बल्कि विद्या...