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Friday, February 27, 2026

उपवास का स्वादिष्ट संस्करण, व्रत हो और खाने को मखाने हों…

हमारे समाज में व्रत अब तपस्या कम और टेस्ट ज्यादा हो गया है। पहले व्रत का मतलब होता था संयम, साधना और आत्मनियंत्रण। लोग दिन भर फलाहार करते थे, पानी पीकर भगवान का नाम लेते थे और शाम को थोड़ा सा प्रसाद खाकर संतोष कर लेते थे।
लेकिन आधुनिक व्रत ने तो खानपान की परिभाषा ही बदल दी है। अब व्रत में भूखे रहने का नहीं, बल्कि “क्या-क्या खाया जा सकता है” का शोध चलता है।
सुबह उठते ही घोषणा होती है —
“आज मेरा व्रत है।”
और उसके साथ ही रसोई में विशेष मेन्यू तैयार होने लगता है।
सबसे पहले मखाने घी में भुनते हैं, फिर कटोरी में काजू-बादाम सजते हैं। फल की प्लेट ऐसी सजती है जैसे किसी होटल का बुफे हो — सेब, संतरा, केला, अनार, पपीता… भगवान भी सोचें कि यह व्रत है या फल महोत्सव!
दोपहर तक भूख थोड़ी बढ़ती है, तो व्रत वाले चिप्स आ जाते हैं।
उनके पैकेट पर बड़े गर्व से लिखा होता है — “उपवास स्पेशल”।
अब भले ही ये तेल में तले हों, मसालों से भरपूर हों, पर क्योंकि उन पर “व्रत” लिखा है, इसलिए यह आध्यात्मिक भोजन घोषित हो जाता है।
और अगर शाम तक भी भूख शांत न हो तो साबूदाना खिचड़ी, कुट्टू के पकौड़े, सिंघाड़े का हलवा… यानी व्रत नहीं, पूरा भोज!
पुराने जमाने के लोग अगर यह दृश्य देख लें तो शायद पूछ बैठें —
“भाई, यह व्रत है या फूड फेस्टिवल?”
सबसे मजेदार बात यह है कि व्रत रखने वाला व्यक्ति दिन भर यही कहता रहता है —
“आज तो कुछ खाया ही नहीं।”
और यह वाक्य बोलते समय उसके सामने फल, मखाने, चिप्स और खीर की प्लेटें गवाही दे रही होती हैं।
व्रत का असली उद्देश्य था मन को नियंत्रित करना, लेकिन अब मन को मनाने का जरिया बन गया है।
पहले लोग भगवान से प्रार्थना करते थे —
“हे प्रभु, शक्ति देना कि व्रत पूरा कर सकूँ।”
अब प्रार्थना कुछ यूँ होती है —
“हे प्रभु, ऐसा आशीर्वाद देना कि व्रत में भी स्वाद बना रहे।”
यह भी एक अद्भुत परंपरा है कि व्रत के दिन सामान्य भोजन नहीं खाया जाएगा, लेकिन व्रत वाला भोजन सामान्य दिनों से ज्यादा स्वादिष्ट और महँगा होगा।
सच तो यह है कि व्रत अब त्याग का नहीं, विकल्पों का उत्सव बन गया है।
भूख से लड़ने की बजाय लोग मेन्यू से खेलते हैं।
निष्कर्ष यही निकलता है कि आज का व्रत हमें आध्यात्मिक कम और पाकशास्त्रीय ज्यादा बना रहा है।
संयम की जगह स्वाद ने ले ली है, और तपस्या की जगह थाली ने।
इसलिए लगता है कि अब व्रत का नया अर्थ होना चाहिए —
“जो दिन सामान्य भोजन से छुट्टी लेकर विशेष भोजन करने का हो, वही व्रत है।”

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