कार्यक्रमों की भीड़ में खोती पढ़ाई
आजकल शिक्षण संस्थानों का स्वरूप तेजी से बदलता दिखाई दे रहा है। शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले कॉलेज और विश्वविद्यालय अब धीरे-धीरे इवेंट, उत्सव और आयोजनों के केंद्र बनते जा रहे हैं। पिछले सप्ताह ही तीन दिन का स्पोर्ट्स मीट हुआ, उसके तुरंत बाद तीन दिन का वार्षिक उत्सव आयोजित कर दिया गया। दो दिन कॉलेज बंद रहा और आज फिर गेस्ट लेक्चर। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है — पढ़ाई आखिर कब होगी?
निस्संदेह, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और अतिथि व्याख्यान छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होते हैं। खेल शरीर को स्वस्थ बनाते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम आत्मविश्वास बढ़ाते हैं और अतिथि व्याख्यान नई दृष्टि प्रदान करते हैं। लेकिन जब ये गतिविधियाँ संतुलन खो देती हैं और नियमित कक्षाओं को पीछे धकेल देती हैं, तब शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित होने लगता है।
छात्र कॉलेज में प्रवेश इसलिए लेते हैं कि वे विषयों का गहन अध्ययन कर सकें, ज्ञान अर्जित कर सकें और अपने भविष्य की नींव मजबूत बना सकें। परन्तु जब सप्ताह भर तक पढ़ाई बाधित रहे, कक्षाएं स्थगित हों और शिक्षक भी कार्यक्रमों की तैयारियों में व्यस्त रहें, तब पाठ्यक्रम अधूरा रह जाता है। परीक्षा के समय जल्दबाजी में सिलेबस पूरा कराने की कोशिश होती है, जिसका परिणाम होता है सतही ज्ञान और बढ़ता हुआ मानसिक दबाव।
आज का छात्र पहले ही प्रतियोगी माहौल, असाइनमेंट, प्रोजेक्ट और करियर की चिंताओं से घिरा हुआ है। यदि पढ़ाई का समय भी आयोजनों में खर्च हो जाए, तो उसके लिए विषयों को समझना और गहराई से पढ़ना कठिन हो जाता है। धीरे-धीरे शिक्षा केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है और डिग्री प्राप्त करना ही लक्ष्य रह जाता है।
संस्थानों को यह समझना होगा कि कार्यक्रम शिक्षा के पूरक होने चाहिए, विकल्प नहीं। यदि पूरे वर्ष में कुछ दिन खेल, संस्कृति और व्याख्यान के लिए निर्धारित हों, तो यह स्वागतयोग्य है। परंतु लगातार कई दिनों तक कक्षाओं का बंद रहना छात्रों के हित में नहीं है। शिक्षा का संतुलन तभी बनेगा जब समय प्रबंधन सही हो और प्राथमिकता पढ़ाई को दी जाए।
जरूरत इस बात की है कि कॉलेज प्रशासन कार्यक्रमों की योजना बनाते समय अकादमिक कैलेंडर का सम्मान करे। एक व्यवस्थित समय-सारिणी बनाई जाए, जिसमें कक्षाएं नियमित चलें और गतिविधियाँ सीमित लेकिन प्रभावी हों। छात्रों की सफलता केवल मंच पर नृत्य करने या खेल प्रतियोगिता जीतने से नहीं, बल्कि ज्ञान और समझ से तय होती है।
अंततः शिक्षा संस्थानों को स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा — क्या हम विद्यार्थियों को भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं, या केवल कार्यक्रमों के लिए? क्योंकि यदि पढ़ाई पीछे छूट गई, तो चमकते मंच और रंगीन उत्सव भी विद्यार्थियों के जीवन में स्थायी उजाला नहीं ला पाएंगे।