वार्षिक कार्यक्रमों की चकाचौंध में खोती लाइब्रेरी की गरिमा
शैक्षणिक संस्थानों में वार्षिक कार्यक्रम उत्सव की तरह मनाए जाते हैं। मंच सजता है, अतिथि आते हैं, भाषण होते हैं, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ होती हैं और संस्थान अपनी उपलब्धियाँ प्रदर्शित करता है। यह सब आवश्यक भी है, क्योंकि ऐसे कार्यक्रम संस्थान की पहचान और ऊर्जा को दर्शाते हैं। परंतु समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन आयोजनों की तैयारी में शैक्षणिक मूल्यों की अनदेखी होने लगे। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति तेजी से देखी जा रही है कि कॉलेजों में वार्षिक कार्यक्रमों के दौरान लाइब्रेरी जैसे गंभीर शैक्षणिक स्थानों का उपयोग अस्थायी व्यवस्था के लिए कर लिया जाता है।
लाइब्रेरी का रीडिंग रूम, जहाँ सामान्य दिनों में विद्यार्थी शांत वातावरण में अध्ययन करते हैं, अचानक कार्यक्रम के समय “अतिथि सत्कार कक्ष” में बदल दिया जाता है। वहीं चाय बनती है, पानी की बोतलें रखी जाती हैं, स्नैक्स पैक होते हैं और स्टाफ की आवाजाही बढ़ जाती है। जिस स्थान की पहचान शांति, अनुशासन और अध्ययन से जुड़ी होती है, वह कुछ ही घंटों में एक अस्थायी कैंटीन जैसा रूप ले लेता है। इससे न केवल लाइब्रेरी का वातावरण प्रभावित होता है बल्कि विद्यार्थियों के मन में भी यह संदेश जाता है कि पढ़ाई से अधिक महत्व दिखावे और आयोजन को दिया जा रहा है।
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं रहती। लाइब्रेरी की कुर्सियाँ और टेबल भी कार्यक्रम की तैयारी में इधर-उधर कर दी जाती हैं। कई बार इन्हें ग्रीन रूम या मेकअप रूम में ले जाया जाता है, जहाँ कलाकार या मेकअप आर्टिस्ट उनका उपयोग करते हैं। इससे फर्नीचर को नुकसान होने की आशंका रहती है और कार्यक्रम के बाद भी लाइब्रेरी को व्यवस्थित होने में समय लगता है। विद्यार्थी जब अगले दिन पढ़ने आते हैं तो उन्हें अपनी परिचित व्यवस्था अस्त-व्यस्त मिलती है।
यह केवल संसाधनों का उपयोग नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का प्रश्न है। यदि किसी संस्थान में लाइब्रेरी को केवल एक खाली कमरा समझा जाता है, जिसे जरूरत पड़ने पर किसी भी काम में लगा दिया जाए, तो यह शिक्षा के मूल उद्देश्य से विचलन का संकेत है। लाइब्रेरी किसी भी शैक्षणिक संस्थान की आत्मा होती है। वहाँ केवल किताबें नहीं होतीं, बल्कि ज्ञान का वातावरण, शोध की संस्कृति और अध्ययन की प्रेरणा होती है। जब उसी स्थान का उपयोग चाय-नाश्ते की व्यवस्था के लिए किया जाता है, तो यह प्रतीकात्मक रूप से भी शिक्षा की प्राथमिकता को कम करता है।
समाधान कठिन नहीं है, बस नियोजन की आवश्यकता है। संस्थान चाहें तो वार्षिक कार्यक्रमों के लिए अलग अस्थायी सेवा कक्ष, कैटरिंग क्षेत्र या स्टाफ रूम निर्धारित कर सकते हैं। यदि परिसर में स्थान सीमित हो तो टेंट या अस्थायी संरचना का उपयोग किया जा सकता है। इससे लाइब्रेरी की गरिमा भी बनी रहेगी और आयोजन भी सुचारु रूप से हो सकेगा। साथ ही, प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी शैक्षणिक सुविधा का उपयोग अंतिम विकल्प के रूप में ही हो, वह भी न्यूनतम हस्तक्षेप के साथ।
वार्षिक कार्यक्रम संस्थान की पहचान बनाते हैं, लेकिन लाइब्रेरी उसकी आत्मा को जीवित रखती है। यदि हम उत्सव के नाम पर अध्ययन की संस्कृति को पीछे धकेल देंगे, तो यह शिक्षा के उद्देश्य के साथ अन्याय होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम आयोजन और अकादमिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाएँ, ताकि मंच की रोशनी के साथ-साथ ज्ञान का दीपक भी समान रूप से जलता रहे।