पढ़ाई की खोज में छात्र : कार्यक्रमों के जंगल में अकादमिकता की तलाश

हमारे शिक्षण संस्थानों में इन दिनों पढ़ाई एक दुर्लभ प्रजाति बन चुकी है। जैसे जंगल में कभी-कभार कोई बाघ दिख जाए तो लोग फोटो खींचते हैं, वैसे ही कॉलेज में यदि गलती से कोई पूरी क्लास हो जाए तो छात्र नोट्स संभालकर रखते हैं — “इतिहास का हिस्सा है भाई, दोबारा नहीं मिलेगा।”
पिछले हफ्ते की ही बात है।
तीन दिन स्पोर्ट्स मीट हुआ।
उसके बाद तीन दिन वार्षिक उत्सव।
फिर दो दिन कॉलेज बंद — शायद उत्सव की थकान उतारने के लिए।
मंगलवार को गेस्ट लेक्चर — ताकि पढ़ाई का भ्रम बना रहे।
और अब शुक्रवार को एक और सेमिनार।
ऊपर से आज बारह में से पाँच फैकल्टी छुट्टी पर।
अब प्रश्न यह नहीं है कि पढ़ाई कैसे होगी।
प्रश्न यह है कि पढ़ाई नाम की चीज़ बची भी है या नहीं।

शिक्षा का नया टाइमटेबल

पहले टाइमटेबल में विषय होते थे — गणित, भौतिकी, साहित्य, अर्थशास्त्र।
अब नया टाइमटेबल कुछ ऐसा है:

सोमवार — रिहर्सल
मंगलवार — गेस्ट लेक्चर
बुधवार — प्रतियोगिता
गुरुवार — तैयारी
शुक्रवार — सेमिनार
शनिवार — फोटो अपलोड

बीच में अगर गलती से क्लास हो जाए तो उसे “अतिरिक्त गतिविधि” कहा जाता है।
छात्र अब सिलेबस नहीं, कार्यक्रमों की श्रृंखला याद रखते हैं।
“अगला चैप्टर कब पढ़ाया जाएगा?”
“पता नहीं, पर अगले हफ्ते पोस्टर प्रतियोगिता है।”

स्पोर्ट्स मीट का अकादमिक महत्व

स्पोर्ट्स मीट तीन दिन चला।
छात्रों ने दौड़ लगाई, कूदे, ट्रॉफी मिली, फोटो आए।
शिक्षक भी खुश — कक्षा से छुट्टी।
छात्र भी खुश — पढ़ाई से छुट्टी।
संस्थान सबसे खुश — सोशल मीडिया पर 200 फोटो।
रिपोर्ट में लिखा गया —
“समग्र विकास हेतु खेलकूद अत्यंत आवश्यक हैं।”
सही बात है।
बस समस्या यह है कि समग्र विकास में पढ़ाई का हिस्सा धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है।

वार्षिक उत्सव : ज्ञान का सांस्कृतिक विसर्जन

फिर तीन दिन वार्षिक उत्सव।
नृत्य, गीत, नाटक, फैशन शो, पुरस्कार।
छात्र मंच पर चमके, शिक्षक मंच के पीछे दौड़े, और आयोजक मंच के सामने मुस्कुराए।
किसी ने पूछा —
“सर, सिलेबस?”
उत्तर मिला —
“फेस्ट के बाद देखेंगे।”
फेस्ट के बाद कॉलेज ही बंद हो गया।
कॉलेज बंद : शांति काल
दो दिन कॉलेज बंद।
कारण स्पष्ट नहीं, पर अनुमान है कि संस्थान को भी आराम चाहिए था।
छात्रों ने सोचा — चलो पढ़ लेते हैं।
पर तभी संदेश आया — 
“मंगलवार को गेस्ट लेक्चर है, अनिवार्य उपस्थिति।”

गेस्ट लेक्चर : ज्ञान का औपचारिक प्रदर्शन

मंगलवार को गेस्ट लेक्चर हुआ।
वक्ता महोदय ने प्रेरणा दी, सफलता के सूत्र बताए, और कहा —
“मेहनत करो, समय का सदुपयोग करो।”
छात्र मन ही मन सोच रहे थे —
“सर, समय तो हम उपयोग करना चाहते हैं, पर क्लास ही नहीं होती।”
लेक्चर समाप्त हुआ, फोटो खिंचे, प्रमाणपत्र मिले।
ज्ञान फिर मंच पर ही रह गया, कक्षा तक नहीं पहुँचा।
शुक्रवार का सेमिनार : अकादमिकता का उत्सव
अब शुक्रवार को एक और सेमिनार।
विषय गंभीर होगा, भाषण लंबे होंगे, और तालियाँ समय पर बजेंगी।
रिपोर्ट में लिखा जाएगा —
“संस्थान में शैक्षणिक वातावरण अत्यंत सक्रिय है।”
सक्रिय तो है ही —
माइक सक्रिय, कैमरा सक्रिय, बैनर सक्रिय…
बस पढ़ाई थोड़ी निष्क्रिय है।

फैकल्टी लीव पर : शिक्षा का गणित

अब स्थिति देखिए।
बारह में से पाँच फैकल्टी छुट्टी पर।
बाकी सात में से:
दो आयोजन में
दो अतिथि स्वागत में
एक मंच संचालन में
एक रिपोर्ट लिखने में
एक छात्रों को बैठाने में
अब बचा कौन पढ़ाने?
शायद ब्लैकबोर्ड खुद ही पढ़ाना शुरू कर दे।

सेल्फ-स्टडी : शिक्षा का रामबाण

जब सिलेबस अधूरा रह जाता है, तो एक जादुई शब्द सामने आता है —
“सेल्फ-स्टडी।”
यह शिक्षा जगत का वह ब्रह्मास्त्र है, जिससे हर समस्या हल हो जाती है।
क्लास नहीं हुई?
सेल्फ-स्टडी।
टीचर नहीं आए?
सेल्फ-स्टडी।
पूरा यूनिट बाकी?
सेल्फ-स्टडी।
ऐसा लगता है कि संस्थान केवल परीक्षा लेने के लिए हैं, पढ़ाई छात्र खुद ही कर लें।
छात्र का नया कौशल
अब छात्र ने भी नया कौशल सीख लिया है —
कार्यक्रमों में बैठना।
तीन घंटे बिना समझे तालियाँ बजाना, सिर हिलाना, और अंत में प्रमाणपत्र लेना —
यह भी एक तरह की ट्रेनिंग है।
शायद भविष्य में नौकरी के इंटरव्यू में पूछा जाए —
“आपका अनुभव?”
छात्र कहे —
“सर, मैंने 40 सेमिनार अटेंड किए हैं, तालियाँ समय पर बजाने में दक्ष हूँ।”

संस्थान की सफलता का पैमाना

अब संस्थान की सफलता पढ़ाई से नहीं मापी जाती।
सफलता के पैमाने हैं:
कितने कार्यक्रम हुए
कितनी फोटो आईं
कितने पोस्ट बने
कितने प्रमाणपत्र छपे
यदि यह सब हो जाए तो शिक्षा स्वतः महान घोषित हो जाती है।
निष्कर्ष : पढ़ाई खोज अभियान

आज छात्र पढ़ाई खोजने निकलता है तो उसे कार्यक्रम मिलते हैं।
वह सिलेबस ढूँढ़ता है तो उसे पोस्टर दिखते हैं।
वह शिक्षक ढूँढ़ता है तो उसे आयोजन सूची मिलती है।
फिर भी रिपोर्ट में लिखा जाएगा —
“संस्थान में अकादमिक गतिविधियाँ नियमित रूप से संचालित हो रही हैं।”
शायद सच भी यही है —
अकादमिकता अब कक्षा में नहीं, रिपोर्ट में संचालित हो रही है।
और छात्र अभी भी इंतज़ार कर रहा है…
कि कभी तो ऐसा दिन आएगा
जब टाइमटेबल में सचमुच पढ़ाई भी लिखी होगी।

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