📰 UTTRA SAMACHAR उत्तरा समाचार
Home India World Tech Sports
Loading breaking news...

गुलाल से गिलास तक: होली का बदलता स्वरूप

कभी होली का नाम लेते ही मन में रंग, गुलाल, ढोलक और फाग की धुन गूंजने लगती थी। गली-मोहल्लों में बच्चे पिचकारी लेकर दौड़ते थे, बुजुर्ग चौपाल में बैठकर “अरे खेले रघुवीरा अवध में होली…” गाते थे और घर-घर से गुजिया और दही-बड़े की खुशबू आती थी। होली का असली रंग लोगों के चेहरों पर नहीं, दिलों में होता था।
लेकिन समय की हवा कुछ ऐसी बदली है कि अब कई जगह होली का रंग गुलाल से कम और गिलास से ज्यादा दिखने लगा है। आजकल होली का मतलब कुछ लोगों के लिए रंग-गुलाल से ज्यादा “दारू का दौर” हो गया है।
सुबह से ही कुछ उत्साही मित्रों की टोली निकल पड़ती है। हाथ में अबीर-गुलाल की छोटी-सी पुड़िया और जेब में बड़ी-सी उम्मीद — कि आज हर घर में “स्वागत पेय” मिलेगा।

पहले घर में घुसते ही आवाज आती है —
“अरे आइए, होली है!”
फिर थोड़ी देर में दूसरा वाक्य —
“कुछ ठंडा-गरम हो जाए?”
अब “ठंडा-गरम” शब्द का अर्थ सब समझते हैं।
टेबल पर बोतल सज जाती है। कोई गर्व से कहता है —
“भाई, इस बार बकार्डी लाई है।”
दूसरा मित्र बोतल को देखकर विशेषज्ञ की तरह सिर हिलाता है, मानो किसी बड़ी प्रदर्शनी का निरीक्षण कर रहा हो।
गिलास बनता है। कोई कहता है —
“बस छोटा-सा पैग बनाओ।”
लेकिन छोटा पैग बनते-बनते कब बड़ा हो जाता है, यह केवल बनाने वाला ही जानता है।
पहला पैग खत्म होते ही टोली आगे बढ़ जाती है।
होली का ‘ब्रांडेड’ सफर

दूसरे घर पहुँचते ही फिर वही स्वागत।
“अरे आओ भाई, रंग लगाओ!”
रंग लगते ही मेज़ पर दूसरी बोतल आ जाती है।
इस बार कोई गर्व से घोषणा करता है —
“आज 8 PM का इंतजाम है।”
अब मित्रों की टोली में से कोई कहता है —
“भाई, थोड़ा छोटा पैग बनाओ।”
दूसरा तुरंत बोलता है —
“अरे आज तो होली है, सब चलेगा।”
तीसरा थोड़ा समझदार बनने की कोशिश करता है —
“कम-कम डालो यार।”
लेकिन जैसे ही गिलास हाथ में आता है, वह भी उसी उत्साह से “चीयर्स” कर देता है।
तीसरे घर की कहानी
अब तक रंग भी थोड़ा-बहुत लग चुका है और “उत्साह” भी थोड़ा बढ़ चुका है।

तीसरे घर पहुँचते ही मेज़ पर नई बोतल दिखाई देती है —
Blenders Pride।
अब तक अलग-अलग ब्रांड पेट में जाकर एकता स्थापित करने लगे हैं।
एक मित्र मुस्कुराते हुए कहता है —
“लगता है कॉकटेल बन गया है।”
दूसरा जवाब देता है —
“अरे होली है भाई, सब ब्रांड मिलकर ही असली रंग बनाते हैं।”
तीसरा मित्र थोड़ा दार्शनिक हो जाता है —
“देखो, यही तो होली की असली भावना है — सब रंग एक हो जाएँ।”
अब यह बात वह रंगों के लिए कह रहा है या बोतलों के लिए, यह समझना मुश्किल हो जाता है।

ब्रांडों का रंगीन संगम
जैसे-जैसे टोली आगे बढ़ती है, ब्रांडों का संग्रह भी बढ़ता जाता है।
कहीं Royal Challenge, कहीं Black Dog, कहीं और कोई नया नाम।
अब हालत यह हो जाती है कि आदमी खुद भी भूल जाता है कि उसने क्या-क्या पी लिया है।
लेकिन उत्साह कम नहीं होता।
कोई कहता है —
“भाई थोड़ा हल्का बनाओ।”
दूसरा कहता है —
“आज तो अमृत पी रहे हैं।”
और सच मानिए, उस समय हर पैग उन्हें अमृत ही लगता है।
रंगों की हालत
इस पूरी यात्रा में रंग भी लगते हैं, लेकिन उनका स्थान थोड़ा पीछे चला जाता है।
गुलाल की पुड़िया अभी भी जेब में है, पर ध्यान ज्यादा गिलास पर है।
किसी के चेहरे पर गुलाल है, किसी के कपड़ों पर रंग है, और किसी के चेहरे पर ऐसी मुस्कान है जो बताती है कि “उत्साह” अपने चरम पर है।
शाम तक हालत यह हो जाती है कि आदमी खुद पहचान नहीं पाता कि उसके चेहरे पर जो लाल रंग है वह गुलाल का है या किसी और कारण का।

पुरानी होली की याद
गली के कोने में बैठे कुछ बुजुर्ग यह सब देखते हैं और हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाते हैं।
उन्हें याद है वह समय जब होली का मतलब केवल रंग और गीत होता था।
ढोलक बजती थी, फाग गाए जाते थे, और लोग केवल हँसी और प्रेम के नशे में रहते थे।
उस समय किसी बोतल की जरूरत नहीं होती थी।
आज भी वे धीरे से कहते हैं —
“होली रंगों का त्योहार है।”
लेकिन उनकी बात सुनने वाला कोई-कोई ही होता है।

त्योहार का बदलता रूप
समय के साथ त्योहारों का स्वरूप बदलना स्वाभाविक है।
लेकिन जब त्योहार का असली अर्थ पीछे छूटने लगे, तो थोड़ा रुककर सोचना भी जरूरी है।
होली का मूल उद्देश्य था —
मन के रंगों को खुलकर व्यक्त करना, पुराने मनमुटाव मिटाना, और रिश्तों में मिठास भरना।
लेकिन अगर त्योहार का केंद्र केवल बोतलें बन जाएँ, तो कहीं न कहीं उसका असली संदेश कमजोर पड़ जाता है।

व्यंग्य का सार
यह व्यंग्य किसी की व्यक्तिगत पसंद पर नहीं है।
हर व्यक्ति अपने तरीके से त्योहार मनाने के लिए स्वतंत्र है।
लेकिन जब हर घर में सबसे पहले गिलास और बोतल दिखाई देने लगे, और रंग-गुलाल केवल औपचारिकता बन जाएँ, तो व्यंग्य अपने-आप जन्म ले लेता है।

निष्कर्ष
होली का असली रंग बोतलों में नहीं, लोगों के दिलों में होता है।
गुलाल का एक छोटा-सा टीका भी उतनी खुशी दे सकता है जितनी किसी महँगे ब्रांड की बोतल नहीं दे सकती।
त्योहार का असली आनंद तब है जब लोग गले मिलें, हँसें, गीत गाएँ और पुराने गिले-शिकवे भूल जाएँ।
अगर होली केवल “ब्रांडों का कॉकटेल” बनकर रह जाए, तो उसके रंग धीरे-धीरे फीके पड़ने लगते हैं।
इसलिए शायद हमें फिर से याद करना चाहिए —
होली का मतलब केवल “चीयर्स” नहीं,
बल्कि “होली है!” की वह सच्ची आवाज है जो दिल से निकलती है।
और वही आवाज इस त्योहार का असली रंग 
Loading news...