मायके का मोह या गहनों का गणित?

भारतीय समाज में “मायका” शब्द सुनते ही आँखों में स्नेह, बचपन की यादें, माँ की रसोई और पिता की डाँट का मिश्रित भाव उभर आता है। मायका वह स्थान माना जाता है जहाँ बेटी का हक़ बिना शर्त होता है, जहाँ वह उम्र भर बच्ची ही रहती है।
पर समय बदलता है, भावनाएँ भी कभी-कभी हिसाब-किताब में बदल जाती हैं। और तब मायका भावनाओं का घर कम, “संभावित संपत्ति” का पता ज़्यादा लगने लगता है।
यह व्यंग्य उसी बदलती मानसिकता पर है — जहाँ कुछ लोग (सिर्फ महिलाएँ ही नहीं, पुरुष भी कम नहीं) बुढ़ापे में माँ-बाप के स्वास्थ्य से कम और उनकी अलमारी से ज़्यादा जुड़ाव रखते हैं।
मायके का हालचाल और लॉकर की लोकेशन
कुछ बेटियाँ साल में दो बार मायके जाती हैं — एक राखी पर, दूसरी दिवाली पर। पर कुछ ऐसी भी होती हैं जिनकी यात्रा का समय बड़ा “रणनीतिक” होता है।
जैसे ही खबर मिलती है कि माँ की तबीयत ढीली है, बेटी तुरंत पहुँच जाती है।
दरवाज़े पर घुसते ही पहला वाक्य —
“अरे माँ, तुम तो बिल्कुल कमजोर हो गई हो!”
और मन में दूसरा वाक्य —
“लॉकर की चाबी कहाँ रखती हो?”
बातों-बातों में पूछ लेंगी —
“माँ, वो पुराना हार कहाँ है? जो नानी ने दिया था?”
माँ भावुक होकर कहेगी —
“बेटा, सब तुम्हारा ही तो है।”
और बेटी के मन में भावनाओं से ज्यादा कैरेट घूमने लगते हैं।
गहनों का पारिवारिक गणित
पहले के समय में गहने केवल साज-श्रृंगार का हिस्सा थे। अब वे “इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो” बन चुके हैं।
माँ की अलमारी में रखी चूड़ियाँ अब केवल चूड़ियाँ नहीं रहीं, वे “भविष्य की संभावना” हैं।
बेटी अपने पति से चर्चा करती है —
“देखो, मम्मी के पास कम से कम दस तोले सोना तो होगा।”
पति भी पूरी गंभीरता से विश्लेषण करता है —
“अगर तीन बहनें हैं तो बराबर बाँटोगे या पहले से कुछ सेटिंग है?”
अब यह पारिवारिक रिश्ता नहीं, मानो कंपनी का शेयर विभाजन हो गया हो।
सेवा या सर्वेक्षण?
कुछ बेटियाँ माँ-बाप की सेवा करने जाती हैं।
कुछ “सर्वेक्षण” करने।
सेवा करने वाली माँ के पाँव दबाती है, दवा देती है, खाना बनाती है।
सर्वेक्षण वाली धीरे-धीरे अलमारी की स्थिति, बक्सों की गिनती और तिजोरी की मजबूती का निरीक्षण करती है।
और जाते-जाते बड़ी मासूमियत से कहती है —
“माँ, तुम तो अब अकेली हो, गहने संभालकर रखना। आजकल ज़माना खराब है।”
असल चिंता ज़माने की कम, हिस्से की ज्यादा होती है।
भाई-बहनों की रणनीति
जब माँ-बाप उम्रदराज़ हो जाते हैं, तो घर में एक अदृश्य दौड़ शुरू हो जाती है।
कौन ज्यादा फोन करता है?
कौन ज्यादा समय बिताता है?
किसे “फेवरिट” का दर्जा मिल रहा है?
क्योंकि सबको पता है —
“फेवरिट” होने का फायदा भविष्य में मिल सकता है।
कभी-कभी तो भाई-बहनों की बातचीत भी बड़ी दिलचस्प होती है —
“दीदी, तुम मम्मी के पास ज्यादा मत जाया करो, लोग बातें करेंगे।”
असल में बात “लोगों” की नहीं, “लॉकर” की होती है।
ममता बनाम माल
विडंबना यह है कि जिन माँ-बाप ने जीवन भर अपनी कमाई बच्चों पर खर्च की, उन्हीं के बुढ़ापे में कुछ बच्चे उनके गहनों की कीमत आँकने लगते हैं।
माँ सोचती है —
“बेटी मुझसे मिलने आई है।”
और बेटी सोचती है —
“देखते हैं, क्या-क्या है अभी।”
यह व्यंग्य केवल महिलाओं पर नहीं है। कई बेटे भी कम नहीं। फर्क बस इतना है कि समाज बेटों के लालच को “हक़” कह देता है, और बेटियों के लालच को “भावनात्मक जुड़ाव” का नाम दे देता है।
अंतिम समय की संवेदनाएँ
सबसे दुखद दृश्य तब होता है जब माँ-बाप के निधन के बाद घर में शोक से ज्यादा चर्चा गहनों की होती है।
एक कोने में लोग आँसू पोंछ रहे होते हैं, दूसरे कोने में फुसफुसाहट चल रही होती है —
“वो कंगन किसे मिलेगा?”
मानो रिश्ते नहीं, वस्तुएँ विरासत बन गई हों।
व्यंग्य का सार
मायका प्रेम का स्थान है, पर जब प्रेम में प्रतिशत जुड़ जाता है तो वह संपत्ति का प्रोजेक्ट बन जाता है।
यह सच है कि बेटियों का भी पैतृक संपत्ति पर अधिकार है। कानून भी यही कहता है, और न्याय भी।
पर अधिकार और लालच में फर्क होता है।
अधिकार सम्मान से लिया जाता है।
लालच गिनती से।
जो माँ-बाप ने जीवन भर दिया, उसका मूल्य सोने के भाव से नहीं आँका जा सकता।
समाप्ति से पहले एक दृश्य
कल्पना कीजिए —
माँ बुढ़ापे में बैठी है, हाथ में पुरानी चूड़ियाँ हैं। वह मुस्कुराकर कहती है —
“ये मैंने तुम्हारी शादी के लिए बनवाई थीं।”
अगर उस समय बेटी के मन में भावनाएँ जागें तो मायका जीवित है।
अगर मन में हिसाब जागे तो मायका सिर्फ पता बनकर रह गया है।

निष्कर्ष
यह व्यंग्य उन मानसिकताओं पर है जो रिश्तों को कैरेट और तोले में तौलने लगती हैं।
मायका प्रेम का स्थान है, निवेश का नहीं।
गहने चमकते जरूर हैं, पर उनसे ज्यादा चमक माता-पिता का स्नेह रखता है।
और अंत में —
जिस दिन हम माँ-बाप की साँसों से ज्यादा उनके सोने की चिंता करने लगें, उस दिन समझ लीजिए कि हमारे भीतर का इंसान “हॉफ” नहीं, लगभग “ऑफ” हो चुका है।


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