पहाड़ों में “माँ” को सिर्फ माँ नहीं कहा जाता, उसे “इजा” कहा जाता है। इस एक शब्द में ममता, त्याग, अनुशासन और अनगिनत यादें समाई रहती हैं। इजा का घर छोटा हो सकता है, पर उसका मन और उसकी गठरी बहुत बड़ी होती है — जिसमें वह बच्चों के लिए सपने भी रखती है और थोड़े-से गहने भी।
इजा के पास कोई बहुत बड़ा खजाना नहीं है। बस एक ग्लोबंद, एक नथ, गले का एक मंगलसूत्र, एक जोड़ी कान के झुमके, एक जोड़ी छोटे टॉप्स, एक शीशफूल, और एक जोड़ी चांदी के पोंजी। यही उसकी पूरी पूँजी है, जिसे उसने सालों सँभालकर रखा है।
ये गहने उसके लिए सिर्फ धातु नहीं, जीवन की कहानी हैं।
ग्लोबंद उसे शादी में मिला था, जब वह नई दुल्हन बनकर इस घर में आई थी। नथ पहाड़ की पहचान है — बड़े जतन से पहनती थी वह, खास त्योहारों और शादियों में। मंगलसूत्र उसके वैवाहिक जीवन की निशानी है, जिसे उसने हर सुख-दुख में अपने गले से लगाए रखा। झुमके और टॉप्स बच्चों के जन्म के बाद बनवाए गए थे, जब घर की हालत थोड़ी सुधरी थी। शीशफूल उसकी युवावस्था की याद है, और चांदी के पोंजी उसके पैरों की वह छनक, जो अब उम्र के साथ धीमी हो चुकी है।
अब इजा बूढ़ी हो चली है। बाल सफेद हो गए हैं, आँखों पर चश्मा चढ़ गया है, पर याददाश्त अभी भी तेज है। एक दिन उसने बच्चों को पास बिठाया और बहुत सहज स्वर में कहा —
“मेरे जाने के बाद नथ और टॉप्स लड़की को दे देना, कान के झुमके नातिनी को। बाकी भाई आपस में बाँट लेना।”
उसकी आवाज़ में कोई लालच नहीं, कोई पक्षपात नहीं। बस एक सादगी थी, जैसे वह रसोई का सामान बाँट रही हो।
पर उस क्षण कमरे में एक अजीब-सी खामोशी छा गई।
बेटी की आँखें भर आईं। उसे नथ या टॉप्स की कीमत से ज्यादा इजा की आवाज़ में छिपी विदाई की आहट सुनाई दे रही थी। नातिनी को शायद अभी गहनों का महत्व समझ में नहीं आता, पर इजा उसे अपनी याद के रूप में कुछ देना चाहती है।
और भाइयों के हिस्से में जो “बाकी” है, वह भी कोई साधारण चीज़ नहीं। मंगलसूत्र, ग्लोबंद, शीशफूल, पोंजी — सब में इजा की छाया है।
यह बँटवारा संपत्ति का कम, भावनाओं का ज्यादा है।
इजा जानती है कि उसके पास करोड़ों की जमीन-जायदाद नहीं है। पर जो थोड़ा-बहुत है, उसे भी वह न्याय से बाँटना चाहती है। उसे यह भी पता है कि आज के समय में गहनों का बँटवारा कई बार रिश्तों में दरार डाल देता है। इसलिए वह अपने रहते ही सब साफ-साफ कह देना चाहती है, ताकि बाद में किसी के मन में मलाल न रहे।
यह दृश्य बहुत साधारण लग सकता है, पर इसमें एक गहरी सामाजिक सच्चाई छिपी है।
पहाड़ों में इजा की पहचान उसके गहनों से भी जुड़ी होती है। नथ केवल आभूषण नहीं, संस्कृति का प्रतीक है। पोंजी केवल चांदी की पायल नहीं, परंपरा की आवाज़ है। मंगलसूत्र केवल सोने की माला नहीं, जीवन भर के साथ की गवाही है।
जब इजा यह सब बाँटने की बात करती है, तो वह केवल चीज़ें नहीं बाँट रही, वह अपनी स्मृतियाँ बाँट रही है।
बेटी के लिए नथ इसलिए, क्योंकि वह जानती है कि बेटी जब उसे पहनेगी तो आईने में खुद को नहीं, अपनी इजा को देखेगी। टॉप्स इसलिए, क्योंकि वे हल्के हैं, रोज़ पहने जा सकते हैं — ताकि याद भी रोज़ बनी रहे।
नातिनी के लिए झुमके इसलिए, ताकि अगली पीढ़ी तक यह रिश्ता पहुँचे।
और बेटों के लिए बाकी सब इसलिए, क्योंकि वे घर की जिम्मेदारी संभालते आए हैं।
यह बँटवारा बराबरी का गणित नहीं, भावनाओं का संतुलन है।
आज के समय में जब संपत्ति के लिए अदालतों के चक्कर लगते हैं, भाई-बहन एक-दूसरे से बात करना छोड़ देते हैं, वहाँ इजा की यह सरल घोषणा बहुत बड़ी सीख देती है।
उसके पास कम है, पर मन में स्पष्टता है।
वह चाहती है कि उसके जाने के बाद घर में झगड़ा नहीं, शांति रहे। उसकी याद आँसुओं में आए, विवाद में नहीं।
यह भी सच है कि गहनों की कीमत समय के साथ बढ़ती है, पर उनसे जुड़ी यादों की कीमत उससे कहीं ज्यादा होती है।
जिस दिन इजा नहीं रहेगी, उस दिन ये गहने तिजोरी में बंद धातु नहीं होंगे, बल्कि घर के कोनों में बसी उसकी आवाज़ होंगे।
जब बेटी नथ पहनेगी, तो उसे इजा का चेहरा याद आएगा।
जब नातिनी झुमके पहनेगी, तो उसे बताया जाएगा — “ये तेरी इजा के थे।”
जब भाई ग्लोबंद को देखेंगे, तो उन्हें याद आएगा कि माँ ने यह शादी में पहना था।
यही असली विरासत है।
इजा की संपत्ति बहुत बड़ी नहीं, पर उसकी सोच बहुत बड़ी है।
वह जानती है कि जीवन अस्थायी है, पर रिश्ते स्थायी हो सकते हैं — अगर उन्हें सही ढंग से सँभाला जाए।
इसलिए उसका यह छोटा-सा बँटवारा केवल गहनों का नहीं, एक संदेश का है —
रिश्तों को बाँटो मत, गहनों को बाँट लो।
और शायद यही पहाड़ की इजाओं की सबसे बड़ी खूबसूरती है —
वे कम में भी संतोष ढूँढ लेती हैं, और अपने बच्चों के लिए जाते-जाते भी रास्ता साफ कर जाती हैं।
इजा के गहने चमकेंगे या नहीं, यह समय बताएगा।
पर उसकी सीख जरूर चमकती रहेगी —
विरासत का असली सोना आपसी प्रेम है।
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