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“नियमों का खेल और लाइब्रेरी स्टाफ की दुविधा”

शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन, स्पष्टता और समानता को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन जब यही संस्थान अपने ही नियमों और व्यवहार में विरोधाभास दिखाने लगते हैं, तो सबसे अधिक प्रभावित वह वर्ग होता है जो सबसे शांत और जिम्मेदार माना जाता है—लाइब्रेरी स्टाफ।
हाल ही की एक घटना इस दोहरे व्यवहार की सच्चाई को उजागर करती है। जब एलजी, विश्वविद्यालय और निदेशक स्तर से “फूलवालों की सैर” के अवसर पर हाफ डे (दोपहर 2 बजे तक) का आधिकारिक नोटिस जारी हुआ, तो स्वाभाविक रूप से स्टाफ ने उसी के अनुसार कार्य किया। लेकिन अगले ही दिन प्रिंसिपल का यह कहना—“मुझे बिना बताए कैसे चले गए?”—एक बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। जब आदेश ऊपर से जारी हुआ था, तो फिर नीचे के कर्मचारियों को दोषी क्यों ठहराया जा रहा है?
यही नहीं, लाइब्रेरी संचालन को लेकर भी विरोधाभास साफ दिखाई देता है। दो दिन पहले निर्देश दिया जाता है कि “क्लास टाइम में छात्रों को लाइब्रेरी में न आने दिया जाए”, और जब उसी निर्देश का पालन किया जाता है, तो अचानक सवाल उठता है—“क्यों नहीं बैठने देते?” अब सवाल यह है कि लाइब्रेरी स्टाफ आखिर किस निर्देश को सही माने?
यह स्थिति केवल भ्रम पैदा नहीं करती, बल्कि कर्मचारियों के मनोबल को भी प्रभावित करती है। जब एक ही कार्य के लिए कभी सराहना और कभी फटकार मिले, तो कार्य करने का आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होने लगता है।
दोहरे व्यवहार का एक और पहलू सामाजिक गतिविधियों में भी देखने को मिलता है। कॉलेज में जब बर्थडे पार्टी, होली, दिवाली या सरस्वती पूजा जैसे आयोजन होते हैं, तो फैकल्टी और प्रिंसिपल कार्यालय में हंसी-खुशी का माहौल बनता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि लाइब्रेरी स्टाफ को इन आयोजनों में शायद ही कभी शामिल किया जाता है।
हाँ, जब किसी काम की जरूरत होती है—जैसे किसी दस्तावेज़ की व्यवस्था, रिकॉर्ड निकालना या अन्य सहायता—तो वही लाइब्रेरी स्टाफ अचानक “जरूरी” हो जाता है और तुरंत बुला लिया जाता है। यह व्यवहार कहीं न कहीं यह संदेश देता है कि लाइब्रेरी स्टाफ को केवल कार्य के समय ही याद किया जाता है, बाकी समय वह संस्थान के सामाजिक ढांचे से बाहर ही रहता है।
शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य केवल पढ़ाई कराना ही नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और समान कार्य वातावरण बनाना भी होता है। जब तक सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार नहीं होगा, तब तक संस्थान का समग्र विकास संभव नहीं है।
लाइब्रेरी केवल किताबों का भंडार नहीं होती, बल्कि यह ज्ञान का केंद्र और संस्थान की रीढ़ होती है। वहां कार्य करने वाले कर्मचारी भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने अन्य विभागों के सदस्य।
अंततः, यह जरूरी है कि प्रबंधन अपने निर्देशों में स्पष्टता लाए और सभी कर्मचारियों के साथ समानता का व्यवहार करे। क्योंकि जब नियम स्पष्ट होंगे और व्यवहार निष्पक्ष, तभी एक सशक्त और सकारात्मक शैक्षणिक वातावरण का निर्माण संभव हो पाएगा।
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