“लाइब्रेरी या मल्टीपर्पज़ हॉल?—ज्ञान के कमरों पर इवेंट का कब्ज़ा”
किसी भी शैक्षणिक संस्थान की लाइब्रेरी को उसका बौद्धिक हृदय माना जाता है। यह वह स्थान होता है जहाँ शांति, एकाग्रता और ज्ञान का वातावरण स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। लेकिन जब यही लाइब्रेरी धीरे-धीरे “मल्टीपर्पज़ हॉल” में बदलने लगे, तो सवाल उठना लाज़िमी है—क्या हम शिक्षा के मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं?
हालात ऐसे हैं कि लाइब्रेरी का एक महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंटेशन रूम अब हर बड़े-छोटे इवेंट में “पेंट्री” के रूप में इस्तेमाल होने लगा है। जहाँ पहले फाइलें, रिकॉर्ड और महत्वपूर्ण दस्तावेज़ सुरक्षित रखे जाते थे, वहाँ अब चाय, समोसे और डिस्पोजेबल कपों की आवाजाही आम हो गई है। हर इवेंट के समय यह कमरा अपने मूल उद्देश्य को भूलकर अस्थायी रसोईघर बन जाता है।
दूसरी ओर, लाइब्रेरी का रीडिंग रूम, जो छात्रों के शांत अध्ययन के लिए बनाया गया था, अब मीटिंग रूम में तब्दील हो चुका है। हर इवेंट से पहले और दौरान, इस कमरे में बैठकों का सिलसिला चलता रहता है। “मीटिंग पर मीटिंग” का ऐसा दौर चलता है कि पढ़ाई के लिए आने वाले छात्र खुद को असहज महसूस करते हैं।
सबसे विडंबनापूर्ण बात यह है कि इन बदलावों को “स्पेस का बेहतर उपयोग” कहकर सही ठहराया जाता है। लेकिन क्या सच में यह बेहतर उपयोग है, या फिर सुविधाओं की कमी का आसान समाधान? अगर हर शैक्षणिक स्थान को इवेंट की जरूरतों के अनुसार बदला जाएगा, तो फिर पढ़ाई के लिए समर्पित जगह कहाँ बचेगी?
इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ता है। जो विद्यार्थी लाइब्रेरी में शांति और एकाग्रता की उम्मीद लेकर आते हैं, उन्हें या तो शोर-शराबे के बीच पढ़ना पड़ता है या फिर निराश होकर वापस लौटना पड़ता है। धीरे-धीरे उनकी पढ़ाई की आदत भी प्रभावित होती है।
लाइब्रेरी स्टाफ के लिए भी यह स्थिति कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। उन्हें एक ही समय में दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है—एक तरफ किताबों और छात्रों की देखभाल, दूसरी तरफ इवेंट की व्यवस्थाओं में सहयोग। इससे उनका मूल कार्य प्रभावित होता है और कार्य का दबाव भी बढ़ता है।
यह स्थिति केवल एक विभाग की समस्या नहीं, बल्कि पूरे संस्थान की प्राथमिकताओं को दर्शाती है। जब इवेंट्स को शिक्षा से अधिक महत्व दिया जाने लगे, तो यह सोचने की जरूरत है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।
समाधान बहुत जटिल नहीं है। यदि संस्थान इवेंट्स के लिए अलग से स्थान निर्धारित करें और लाइब्रेरी को उसके मूल स्वरूप में रहने दें, तो यह समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है।
अंततः, यह समझना जरूरी है कि लाइब्रेरी केवल एक कमरा नहीं, बल्कि ज्ञान और सीखने की संस्कृति का प्रतीक है। यदि हम उसे “पेंट्री” और “मीटिंग हॉल” में बदलते रहेंगे, तो कहीं न कहीं हम शिक्षा की नींव को कमजोर कर रहे हैं।
क्योंकि जहाँ किताबों की जगह कप और प्लेटें ले लें, वहाँ ज्ञान की आवाज़ धीरे-धीरे दबने लगती है।