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Thursday, March 19, 2026

“फिर एक बार—इवेंट और लाइब्रेरी बनी पेंट्री”

दिनांक 18 मार्च, कभी ज्ञान का मंदिर कही जाने वाली लाइब्रेरी आजकल एक नए अवतार में नजर आ रही है—“मल्टीपर्पज पेंट्री हॉल”! और यह बदलाव भी कोई अचानक नहीं आया, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से “इवेंट कल्चर” के पवित्र प्रभाव से संभव हुआ है।
जैसे ही कॉलेज में किसी इवेंट की घोषणा होती है, सबसे पहले जिस जगह की कुर्बानी तय होती है, वह है—लाइब्रेरी। जहां कल तक किताबों की खुशबू, पन्नों की सरसराहट और विद्यार्थियों की गंभीरता दिखाई देती थी, आज वहां चाय की केतली, समोसे की ट्रे और डिस्पोजेबल कपों की कतारें सज जाती हैं।
लाइब्रेरियन साहब भी अब किताबों के बीच कम और कुर्सियों की व्यवस्था, टेबल हटाने और केटरिंग वालों को दिशा देने में ज्यादा व्यस्त दिखते हैं। “साइलेंस प्लीज़” की जगह अब “चाय गरम है, जल्दी ले लो” की आवाज गूंजती है।
किताबें? अरे वो तो कोनों में सिमटकर खुद सोच रही होती हैं कि आखिर उनका कसूर क्या था! जो जगह विद्यार्थियों के ज्ञान-वर्धन के लिए बनी थी, वहां अब प्लेटों की खनखनाहट और गपशप का शोर गूंजता है।
इवेंट खत्म होते ही लाइब्रेरी का दृश्य और भी दिलचस्प हो जाता है—कहीं आधी बची चाय, कहीं कुर्सियों के नीचे पड़े चिप्स के पैकेट, और टेबलों पर छोड़े गए गिलास। सफाई कर्मचारी भी सोच में पड़ जाते हैं कि यह लाइब्रेरी है या शादी का बैंकेट हॉल!
सबसे मजेदार बात यह है कि इस पूरे परिवर्तन को “मैनेजमेंट स्किल” और “इन्फ्रास्ट्रक्चर का बेहतर उपयोग” का नाम दिया जाता है। यानी किताबों को हटाकर समोसे रखने को भी अब “इनोवेशन” कहा जाने लगा है।
विद्यार्थी भी दो भागों में बंट जाते हैं—एक वे जो पढ़ने आते हैं और निराश होकर लौट जाते हैं, और दूसरे वे जो चाय-नाश्ते का आनंद लेते हुए सोचते हैं कि “यही असली कॉलेज लाइफ है!”
कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि भविष्य में लाइब्रेरी का नाम बदलकर “नॉलेज कैफे” रख दिया जाएगा, जहां किताबें केवल सजावट के लिए होंगी और असली आकर्षण होगा—फ्री स्नैक्स और सेल्फी पॉइंट।
इस व्यंग्य के पीछे एक गंभीर सच्चाई छिपी है। अगर लाइब्रेरी जैसे महत्वपूर्ण स्थान को बार-बार इवेंट और पेंट्री में बदल दिया जाएगा, तो विद्यार्थियों का अध्ययन प्रभावित होना तय है। शिक्षा का केंद्र अगर धीरे-धीरे मनोरंजन का केंद्र बन जाएगा, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।
अंततः सवाल यही है—क्या हम लाइब्रेरी को लाइब्रेरी रहने देंगे, या उसे “इवेंट स्पेस” बनाकर ज्ञान को कोनों में धकेलते रहेंगे?
फिलहाल तो हालात यही कहते हैं—
“फिर एक बार, इवेंट आया… और लाइब्रेरी पेंट्री बन गई!”

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